CBFC Board Reconstituted: केंद्र सरकार ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सीबीएफसी का नए सिरे से पुनर्गठन किया है. इस नए बोर्ड में कुल 18 सदस्यों को शामिल किया गया है, जिनका कार्यकाल तीन साल का होगा. यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है जब फिल्मों की रिलीज, उनमें लगने वाले कट और प्रमाणन को लेकर फिल्म निर्माताओं और दर्शकों के बीच अक्सर तीखी बहस देखने को मिलती है. लंबे समय से बोर्ड के पुनर्गठन की मांग की जा रही थी, जिसे अब अमलीजामा पहना दिया गया है.
लंबे इंतजार के बाद बोर्ड का पुनर्गठन
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अनुसार, बोर्ड के पुनर्गठन की प्रक्रिया काफी समय से लंबित थी. मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि पुराने बोर्ड के कई सदस्य अब सक्रिय नहीं थे, जबकि कुछ सदस्यों का कार्यकाल के दौरान ही निधन हो गया था. नियमों के अनुसार बोर्ड का गठन आमतौर पर हर तीन साल में किया जाना चाहिए. पिछली बार साल 2017 में 12 सदस्यों के साथ इसका गठन किया गया था. अब करीब नौ साल के लंबे अंतराल के बाद बोर्ड में बदलाव हुआ है और सदस्यों की संख्या बढ़ाकर 18 कर दी गई है.
फिल्मों की रिलीज पर कैंची और विवाद
हाल के दिनों में फिल्मों के प्रमाणन को लेकर काफी खींचतान देखने को मिली है. इसका सबसे बड़ा और चर्चित उदाहरण अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' रही, जिसका पुराना नाम 'पंजाब 95' था. यह फिल्म साल 2022 में सीबीएफसी के पास प्रमाणन के लिए भेजी गई थी. इसके बाद फिल्म को बोर्ड से मंजूरी पाने के लिए लगभग तीन साल तक लंबा इंतजार करना पड़ा. फिल्म निर्माताओं का आरोप था कि बोर्ड ने इस फिल्म में करीब 127 कट लगाने की मांग रखी थी.
जब यह फिल्म नए नाम 'सतलुज' के साथ बिना किसी कट के एक डिजिटल मंच पर रिलीज हुई, तो इसे लेकर नया विवाद खड़ा हो गया. मंच पर आने के महज 48 घंटे के भीतर ही इस फिल्म को भारतीय दर्शकों के लिए हटा लिया गया. इस पूरी घटना ने यह साफ कर दिया कि सेंसर बोर्ड के फैसले किसी भी फिल्म के भविष्य और उसकी रिलीज की राह को किस तरह बदल सकते हैं. भारी कट, बदलाव और लंबी देरी के कारण फिल्म निर्माताओं को भारी नुकसान भी उठाना पड़ता है.
सेंसर बोर्ड की जांच के दायरे में आई अन्य फिल्में
सेंसर बोर्ड की सख्त जांच केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं रही है. कई अन्य फिल्मों को भी रिलीज से पहले बोर्ड की कड़ी शर्तों का सामना करना पड़ा है. उदाहरण के तौर पर फिल्म 'वेलकम टू द जंगल' को 18 बदलावों के बाद ही यूए 16 प्लस का प्रमाण पत्र दिया गया. इसी तरह फिल्म 'जन नायकन' को लेकर भी प्रमाणन का विवाद काफी गहरा गया था, जिसके चलते मामला कोर्ट तक जा पहुंचा और फिल्म की रिलीज में देरी हुई. इन लगातार सामने आते विवादों की वजह से फिल्म जगत के भीतर से भी बोर्ड के रवैये को लेकर लगातार आवाजें उठ रही थीं.
सिनेमा जगत के कई बड़े चेहरों को मिली जिम्मेदारी
सरकार द्वारा गठित 18 सदस्यीय नए बोर्ड में भारतीय सिनेमा और कला जगत के कई बड़े नामों को जगह दी गई है. इनमें जाने-माने अभिनेता मनोज जोशी, सुनील शेट्टी, अभिनेत्री प्रीति जिंटा, पंकज त्रिपाठी और बंगाली सिनेमा के दिग्गज अभिनेता प्रोसेनजीत चटर्जी शामिल हैं. इसके अलावा मशहूर फिल्म निर्देशक प्रियदर्शन और संगीतकार रिकी केज भी इस बोर्ड का हिस्सा बनाए गए हैं.
बोर्ड में शामिल अन्य सदस्यों में विनोद अनुपम, अभिषेक जैन, गायक और पूर्व सांसद हंसराज हंस, सुप्रिया यार्लागड्डा, यतींद्र मिश्र, टीवी अभिनेत्री रूपाली गांगुली, नीला माधब पांडा, पल्लवी जोशी, निशिगंधा वाड, वामन केंद्रे और रमेश पतंगे का नाम शामिल है. इन सभी सदस्यों को कला, सिनेमा और संस्कृति के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए बोर्ड में शामिल किया गया है.
कानूनी प्रक्रिया और बोर्ड के अधिकार
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि यह पुनर्गठन सिनेमैटोग्राफ अधिनियम 1952 की धारा 3 की उपधारा (1) और सिनेमैटोग्राफ (प्रमाणन) नियम 2024 के नियम 3 के तहत मिले अधिकारों का उपयोग करते हुए किया गया है. नया बोर्ड तुरंत प्रभाव से लागू हो गया है और यह तीन साल की अवधि या अगले आदेश तक इसी रूप में काम करता रहेगा.
इस पुनर्गठन से बोर्ड के कानूनी अधिकारों या उसकी तय भूमिका में कोई बदलाव नहीं हुआ है. सीबीएफसी पहले की तरह ही सिनेमैटोग्राफ कानून और 2024 के नियमों के आधार पर फिल्मों की जांच और प्रमाणन का काम जारी रखेगा. फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब फिल्मों की समीक्षा करने और प्रमाण पत्र जारी करने वाली टीम में नए चेहरे शामिल हो गए हैं. अब देखना यह होगा कि नई टीम के आने के बाद प्रमाणन प्रक्रिया में कितनी तेजी और पारदर्शिता आती है.
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