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अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है मीलॉर्ड... यूजीसी-नेट परीक्षा दोबारा कराने के फैसले को चुनौती, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब

September 4, 2026

यूजीसी-नेट 2026 अंग्रेजी परीक्षा दोबारा कराने के NTA के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। कोर्ट ने केंद्र और NTA से जवाब मांगते हुए फीस वापसी पर विचार का निर्देश दिया है।

देश भर के लाखों युवा दिन-रात एक करके जिस परीक्षा की तैयारी करते हैं अगर अचानक उसे रद्द करके दोबारा कराने का फरमान आ जाए, तो मायूसी और गुस्सा आना लाजमी है। यूजीसी-नेट (UGC-NET) जून 2026 की अंग्रेजी विषय की परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों के साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ है। लेकिन अब इन छात्रों ने खामोश बैठने के बजाय सीधे अदालत का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है। दिल्ली हाईकोर्ट में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) और केंद्र सरकार के इस फैसले को खुली चुनौती दी गई है। छात्रों की नाराजगी इस बात को लेकर है कि आखिर किस आधार पर पूरी परीक्षा को दोबारा थोपा जा रहा है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने भी इस पर अपना सख्त रुख अपनाया है।

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जस्मीत सिंह की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) को नोटिस थमा दिया है। अदालत ने साफ तौर पर इन दोनों संस्थाओं से जवाब तलब किया है कि आखिर अंग्रेजी की परीक्षा दोबारा कराने की नौबत क्यों आई। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 6 अक्टूबर की तारीख तय की है। सिर्फ इतना ही नहीं, हाईकोर्ट ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया है कि वो छात्रों की परीक्षा फीस वापस करने के मसले पर जल्द से जल्द कोई ठोस फैसला लें, ताकि छात्रों पर आर्थिक बोझ न पड़े।

कब से शुरू हुआ विवाद

सारा विवाद 16 अगस्त को शुरू हुआ था, जब एनटीए ने एक सार्वजनिक सूचना जारी कर यह ऐलान किया कि यूजीसी-नेट जून 2026 की अंग्रेजी विषय की परीक्षा फिर से कराई जाएगी। उम्मीदवारों का कहना है कि यह फैसला पूरी तरह से एकतरफा, गैर-जरूरी और मनमाना है। अर्जी दाखिल करने वाले छात्रों ने अदालत को बताया कि एनटीए ने उन्हें वो वजहें या सुबूत बताए ही नहीं, जिनके आधार पर इतना बड़ा फैसला ले लिया गया। छात्रों का यह भी आरोप है कि परीक्षा की सूचना पुस्तिका (इंफॉर्मेशन बुलेटिन) में जो नियम और कायदे तय किए गए थे, उनका जरा भी पालन नहीं किया गया। यह फैसला सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14 यानी समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है, क्योंकि इसमें पारदर्शिता और निष्पक्षता की साफ कमी नजर आ रही है।

याचिकाकर्ताओं की मांग बिल्कुल सीधी और जायज है। उनका कहना है कि पहले जो अंग्रेजी विषय की परीक्षा हो चुकी है, उसी का रिजल्ट घोषित किया जाना चाहिए। अगर कोई गड़बड़ी है, तो तय प्रक्रिया का पालन हो। मसलन, पहले आंसर-की (उत्तर कुंजी) जारी की जाए, छात्रों को उस पर आपत्ति जताने का मौका मिले, विशेषज्ञों की टीम उसकी जांच करे और अगर कोई सवाल गलत पाया जाता है, तो उसे हटाकर नई आंसर-की जारी हो। इसके बाद ही मूल्यांकन करके अंतिम परिणाम निकाला जाए। बिना किसी ठोस वजह के रातों-रात परीक्षा रद्द करके दोबारा कराने का हुक्म सुनाना उनके अधिकारों के साथ सीधा खिलवाड़ है।

छात्रों ने अदालत के सामने क्या रखी मांग

इसके अलावा, छात्रों ने अदालत के सामने एक बेहद अहम और वैकल्पिक मांग भी रखी है। उनका कहना है कि अगर हाईकोर्ट किसी वजह से दोबारा परीक्षा कराने के एनटीए के फैसले को सही भी मानता है, तो कम से कम छात्रों के हितों का ध्यान रखा जाए। इसके तहत, उम्मीदवारों ने जो परीक्षा शुल्क (फीस) पहले जमा किया था, वो उन्हें तुरंत वापस मिलना चाहिए। इसके साथ ही, दोबारा होने वाली परीक्षा में बैठने के लिए उनसे कोई अतिरिक्त पैसा नहीं लिया जाना चाहिए। अदालत ने इस बात को काफी गंभीरता से सुना है और अधिकारियों को इस आर्थिक पहलू पर भी विचार करने और फैसला लेने का निर्देश दिया है।

फिलहाल, दिल्ली हाईकोर्ट ने परीक्षा दोबारा कराने के फैसले पर कोई अंतिम रोक नहीं लगाई है और न ही अपनी आखिरी राय जाहिर की है। लेकिन केंद्र और एनटीए से जवाब मांगकर यह साफ कर दिया है कि बिना ठोस वजह के मनमाने फैसले नहीं थोपे जा सकते। अब सबकी निगाहें 6 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि महीनों मेहनत करने वाले इन छात्रों को इंसाफ मिलता है या उन्हें दोबारा परीक्षा के तनाव से गुजरना पड़ेगा।

रिपोर्ट: प्रमुख संवाददाता, नई दिल्ली