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100 रुपये के लिए खूनी बवाल... 20 साल पुराना वो केस, जिसमें 3 भाइयों समेत 4 को 5-5 साल की जेल

October 4, 2026

100 Rupees Dispute Bareilly: उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की एक अदालत ने 20 साल पुराने एक बहुचर्चित मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. मात्र 100 रुपये के लेनदेन को लेकर वर्ष 2006 में शुरू हुए खून-खराबे और जानलेवा हमले के मामले में अपर सेशन जज-13 उमाशंकर कहार की अदालत ने चार आरोपियों (तीन सगे भाइयों) को दोषी करार दिया है. कोर्ट ने चारों को 5-5 साल के कठोर कारावास और कुल 44 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है. वहीं, इसी विवाद के दौरान हुई एक व्यक्ति की मौत के मामले में दूसरे पक्ष के पिता-पुत्र को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया है.

मामला बरेली के देवरनियां थाना क्षेत्र स्थित पिपरा नानकार गांव का है. अभियोजन पक्ष के अनुसार, जनवरी 2006 की दोपहर इकबाल और उसके बेटे सरताज की आरोपित पक्ष से उधार के 100 रुपये को लेकर कहासुनी हुई थी. उस समय ग्रामीणों ने बीच-बचाव कर मामला शांत करा दिया था.

आरोप है कि उसी दिन शाम करीब 6 बजे बाबू, सलीम, नईम (तीनों सगे भाई) और उनका एक साथी चाकू व लाठी-डंडे लेकर इकबाल के घर में घुस आए. उन्होंने घर के अंदर मौजूद इकबाल, उसके बेटे सरताज और बहन कनीज पर जानलेवा हमला कर दिया.

शोर सुनकर पहुंचे ग्रामीणों को देखकर हमलावर भागने लगे. इसी छीना-झपटी और मारपीट के दौरान हमलावर पक्ष के अकरम को भी चाकू लग गया था, जिसकी बाद में इलाज के दौरान मौत हो गई थी. इसके बाद दोनों पक्षों की ओर से क्रॉस FIR दर्ज कराई गई थी.

कोर्ट की अहम टिप्पणी: नीयत जान लेने की थी तो धारा 307 सिद्ध

जानलेवा हमले (धारा 307) के मुकदमे में डीजीसी क्राइम रीतराम राजपूत ने अदालत में 8 गवाह पेश किए. सुनवाई के दौरान अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया. धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत दोष साबित करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि पीड़ित को कोई जानलेवा चोट ही लगी हो. यदि हमलावर की मंशा या नीयत जान लेने की थी, तो भी धारा 307 का अपराध पूरी तरह सिद्ध होता है. अदालत ने बाबू, सलीम, नईम और उनके साथी को धारा 307 का दोषी पाते हुए 5-5 साल की जेल और 44,000 जुर्माने की सजा सुनाई.

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अकरम मर्डर केस: पिता-पुत्र को क्यों मिला संदेह का लाभ?

दूसरे पक्ष द्वारा दर्ज कराए गए हत्या के मुकदमे में आरोप था कि इकबाल ने छुरी से अकरम के सीने पर वार कर उसकी हत्या की थी. हालांकि, कोर्ट ने पाया कि घटना पीड़ित इकबाल के घर के अंदर हुई थी, जहां हमलावर पक्ष हथियार लेकर घुसा था. हमले में कनीज और सरताज के सिर पर गंभीर चोटें आई थीं तथा इकबाल भी घायल हुआ था. अभियोजन पक्ष पीड़ित परिवार को लगी इन गंभीर चोटों का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका.

बचाव पक्ष की यह दलील तर्कसंगत पाई गई कि छीना-झपटी के दौरान खुद हमलावर पक्ष की छुरी अकरम को लग गई थी. इन्हीं विरोधाभासों और संदेह के आधार पर अदालत ने इकबाल और उसके बेटे सरताज (उर्फ गुड्डू) को अकरम की हत्या के आरोपों से बरी कर दिया.

नाबालिग का मामला जेजेबी में लंबित

बचाव पक्ष के अधिवक्ता अमजद सलीम ने बताया कि इस घटना में शामिल एक अन्य आरोपी घटना के समय नाबालिग (किशोर) था, इसलिए उसका मामला सुनवाई हेतु पहले ही किशोर न्याय बोर्ड (JJB) को भेजा जा चुका है.

मनवीर सिंह

मनवीर सिंह

मैं मनवीर सिंह 6 साल से पत्रकारिता कर रहा हूं. 5 साल से टीवी9 भारतवर्ष न्यूज चैनल में सेवा दे रहा हूं. इससे पहले आजतक न्यूज चैनल के लिए भी काम किया है. क्राइम और राजनीति से जुड़ी खबरें पसंद हैं.

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